क्यूँ दर्द मांगता है इश्क़ मेरा
क्यूँ दिल मे चाहता है बसेरा
दिल्लगी से जूनून सा बन बैठा
क्यूँ बेवजह इंतज़ार करे तेरा
क्यूँ परवाह नही वक़्त की
क्या रात , क्या सवेरा
क्यूँ बेवरवाह ज़माने से
क्यूँ देखता ख्वाब सुनहरा
लगने लगे रुसवाइयों का पहरा
फिर भी मन पंछी बन मेरा
तेरे ही ख्यालों की डाल पर
बस डालना चाहे डेरा…………
न कोई ज़ख्म, दर्द फिर क्यूँ,
सागर की गहराइयों से गहरा,
बदल रही दुनिया मेरी
फिर भी लगे वक़्त क्यों ठहरा।
भावभीनी कविता के लिए आभार ,रीना 😊
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आभार 💐💐💐
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🙏🏾
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मार्मिक लेकिन भावपूर्ण पंक्तियाँ❤
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आभार😊💕
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इस क्यूं का कोई जवाब नहीं है, इसे ढूंढते ढूंढते कई कविताएं भले हम लिखते रहें। On a serious note, यह एक भावपूर्ण कविता है, जिसे आपने बड़ी तन्मयता से लिखा है। बहुत खूब।😊💐💐
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बहुत बहुत हृदय से आभार आपका🌷😊💐💐
आपके शब्द प्रेरणा के अविरल श्रोत हैं
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