खुद से तो टकराओ कभी
क्यूँ टकराते हो चट्टानों से
खुद से तो पूछो सवाल कभी
क्यूँ पूछते हो अंजानो से
खुद को तो मिलों कभी
क्यूं मिलते हो तकलीफों से
खुद को तो तराशों कभी
क्यूँ तराशते हो चट्टानों को
खुद से तो उलझो कभी
यूँ उलझते हो सवालो से
खुद से तो टकराओ कभी
क्यूँ टकराते हो चट्टानों से

Image. Pinterest .com
वाह, बहुत सुन्दर कविता…
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आभार sir😊
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अमिताभ का कभी कभी और आपका कभी दोनों सुंदर है|
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😊😍आभार मित्र ❣️
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धन्यवाद 💜
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And this is what never ends…
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Thank you 🌷💕
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So true😊👌
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Beautiful insight Reena,, nice to meet u here
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It’s mutual , I am also glad to get connected😊🌷
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😊💕🌷
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अति सुन्दर👌👌💐💐 सारे सवालों का जवाब अपने पास ही होता है, पर मृग की तरह कस्तूरी की तलाश में मूढ़ मानव भी भटकता रहता है।
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Sir आपके शब्दों की बहती धारा हमेशा सबको हृदय को ज्ञान प्रदान करती हुई निकलती है ,
आभार💕🌷🌷😊
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waah!waah!agreed!
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Thank you so much, 🌷😊❣️
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This is lovely, Reena. 💕
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Thank you so much
बहुत बहुत आभार😊❣️
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You’re most welcome. Always. ❤️
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Beautiful lines, especially the combination कभी – क्यों 👌👏
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Thank you so much, VM🌷😊❣️
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💐
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