तेरी यादें

साँझ सवेरे तेरी यादों में,
विलुप्त हुई हूँ कई बार,
जागती रहती हूँ,
सोने का बहाना करके,
नहीं चाँद से शिकायत,
की चाँदनी मिलती नहीं,
मेरी ख़ुद की ही साँसे,
अब मुझसे सँभलती नहीं,,,,

8 thoughts on “तेरी यादें

  1. साँझ सवेरे जो आप यूँ ही खो जाती हैं,
    यादों की रौ में हर बार भीग जाती हैं।

    जागती हैं आप, नींद का बहाना करके,
    इश्क़ से रिश्ता है सोकर भी जाग जाती हैं।

    चाँद से क्या गिला, न चाँदनी से शिकवा,
    जब साँसें ही अब ख़ुद को सँभाल न पाती हैं।
    -विजय

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      1. आपका आभार स्वीकार है, रीना जी।🌹
        शब्द तो बस एक माध्यम हैं, असल संवाद तो भावों की उस ख़ामोश संगति में होता है, जहाँ कविता
        कविता को पहचान लेती है।
        -विजय

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  2. लाजवाब! आपकी यह कविता सीधे दिल पर दस्तक देती है। साँसों का सँभलना और यादों का बिखरना… बहुत ही उम्दा प्रस्तुति।

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