हवा -सा वो क्षण ,,,,,

सुनो ,

देखो तो जरा ,
हर एक क्षण कैसे ,
अतीत बनता जा रहा है ,
कैसे ये वक्त भ्रमित सा ,
जिद्दी सा ,भागता जा रहा है,
कोई बाँधो इसे यादों के खूँटें से ,
मेरे आज़ को आग़ोश में लिए जा रहा है,,,,

8 thoughts on “हवा -सा वो क्षण ,,,,,

  1. देखा है हमने भी वक़्त को यूँ ही,
    हर लम्हा पैदा होते ही अतीत बनते हुए।
    ज़िद्दी है, भटका हुआ सा,
    मुट्ठी से रेत की तरह
    फिसलता चला जाता है।
    अगर इसे यादों के खूंटे से बाँध भी लो,
    तो डर है,,,
    कहीं ये
    आपका आज
    अपने ही आग़ोश में
    और गहरा न कर ले।
    -विजय

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      1. आपका बहुत-बहुत आभार, रीना जी।🙏
        आपके शब्दों की सहजता और संवेदना
        स्वयं में ही एक सुंदर संवाद रच देती है।

        यह तो शब्दों का सौभाग्य है
        कि वे आपके भावों से जुड़ पाए।

        यह आदान-प्रदान यूँ ही
        भावों की गरिमा बनाए रखे।
        -विजय

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  2. वाह! इन पंक्तियों ने एक पल के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया। ‘हर एक क्षण कैसे अतीत बनता जा रहा है’ — यह लाइन बहुत भारी है। हम सब यही महसूस करते हैं, पर आप इसे शब्दों में बहुत खूबसूरती से लाए हैं।

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