Mehfil Reenabist blogging 31st Dec 2025 1 Minute Share Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Like Loading... Related Published by Reenabist love nature and has a passion for writing View all posts by Reenabist Published 31st Dec 2025
शामिल तेरी तन्हाई में मेरा होना मुनासिब है, मैं देखूँ ख़ुद को ख़ुद में, किसी और में नहीं। चाहत ने सलीका सिखा दिया ख़ामोश रहने का, जहाँ इज़्ज़त न बचे, वहाँ इश्क़ की ज़िद नहीं। रुसवाई से बेहतर है चुपचाप बिखर जाना, दीदार अगर बोझ बने, तो दीदार वाजिब नहीं। तबियत तो बहल जाती है ज़माने के शोर में, पर तेरे बाद किसी और महफ़िल में मेरा होना मुनासिब नहीं। -विजय (महोदधि बा अदब) LikeLiked by 1 person Reply
शामिल तेरी तन्हाई में मेरा होना मुनासिब है,
मैं देखूँ ख़ुद को ख़ुद में, किसी और में नहीं।
चाहत ने सलीका सिखा दिया ख़ामोश रहने का,
जहाँ इज़्ज़त न बचे, वहाँ इश्क़ की ज़िद नहीं।
रुसवाई से बेहतर है चुपचाप बिखर जाना,
दीदार अगर बोझ बने, तो दीदार वाजिब नहीं।
तबियत तो बहल जाती है ज़माने के शोर में,
पर तेरे बाद किसी और महफ़िल में
मेरा होना मुनासिब नहीं।
-विजय (महोदधि बा अदब)
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अहा खूबसूरत रचना
आभार आपका 🙏🙏
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