2 thoughts on “Mehfil

  1. शामिल तेरी तन्हाई में मेरा होना मुनासिब है,
    मैं देखूँ ख़ुद को ख़ुद में, किसी और में नहीं।

    चाहत ने सलीका सिखा दिया ख़ामोश रहने का,
    जहाँ इज़्ज़त न बचे, वहाँ इश्क़ की ज़िद नहीं।

    रुसवाई से बेहतर है चुपचाप बिखर जाना,
    दीदार अगर बोझ बने, तो दीदार वाजिब नहीं।

    तबियत तो बहल जाती है ज़माने के शोर में,
    पर तेरे बाद किसी और महफ़िल में
    मेरा होना मुनासिब नहीं।

    -विजय (महोदधि बा अदब)

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