थोड़ी सी ज़मीन

असीमित आसमान सा सफ़र,
बना दिया न जाने क्यों ,
ज़िन्दगी को तो बस थोड़ी सी ,
ज़मीन ही काफ़ी थी,,

खामोश आवाज़े भी हैं ,
वक्त के तक़ाज़े भी हैं,
देखतें है सुकून कहाँ से मिलता है,,,,,

8 thoughts on “थोड़ी सी ज़मीन

  1. रीना जी, आपकी पंक्तियाँ जैसे खामोश आसमान और सीमित ज़मीन के बीच जीवन की अनकही कहानी बुन रही हों। 🌌

    खामोश आवाज़ें और वक्त के तक़ाज़े, सब मिलकर सुकून की तलाश में मन को गहराई से झंकाते हैं।

    सच में, आपकी कविता में अलंकार और प्रतीकात्मकता की वह मधुर लय है जो सीधे दिल को छू जाती है।

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  2. असीमित आसमान सा सफ़र,
    बना दिया न जाने क्यों,,,
    ज़िन्दगी को तो बस थोड़ी सी,
    ज़मीन ही काफ़ी थी, सिर्फ़ थोड़ी सी।

    खामोश आवाज़ें गूँजती हैं,
    वक्त के तक़ाज़े थमते नहीं।
    हर सांस में उलझे हुए सवाल,
    देखते हैं, सुकून कहाँ से मिलता है।

    छोटे-छोटे लम्हों में बसी,
    अनकहे ख्वाबों की हल्की धुंध।
    मन की गहराईयों में बहती नदी सी,
    शांति की तलाश करती हर क़दम।

    पर सफ़र रुका नहीं,
    हर खामोश पल में भी कुछ कहता है।
    जैसे सितारे रात को राह दिखाएँ,
    वैसे ही यादें, उम्मीद और दर्द,
    हमें अपने भीतर की रोशनी से मिलाते हैं।

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    1. इतना सुंदर और विस्तृत स्वरूप मेरे विचारों को देने के लिए दिल से आभार 🙏🙏

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      1. रीना जी, आपके इन आत्मीय शब्दों के लिए हृदय से आभार। 🙏
        वास्तव में, यह तो आपके विचारों की गहराई और संवेदनशीलता ही है, जिसने उन्हें यह रूप दिया। मैं तो केवल शब्दों का एक विनम्र माध्यम बना।
        आपकी रचनात्मकता यूँ ही प्रवाहित होती रहे और ऐसे ही सुंदर भाव शब्दों में ढलते रहें, यही कामना है।
        -विजय

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