न अर्थहीन , न अर्थमय,
न संशय , न कोई भय ,
कैसी अनुभूति है ये ,
शांत मन में जैसे प्रलय ,
भावुक भी हूँ ,
और विचारमग्न भी ,
शब्द प्रवाहित हो न जाएँ,
मौन असमर्थ सा है,
मेरी कविता का जन्म हो चुका है ❤️
न अर्थहीन , न अर्थमय,
न संशय , न कोई भय ,
कैसी अनुभूति है ये ,
शांत मन में जैसे प्रलय ,
भावुक भी हूँ ,
और विचारमग्न भी ,
शब्द प्रवाहित हो न जाएँ,
मौन असमर्थ सा है,
मेरी कविता का जन्म हो चुका है ❤️
रीना जी,
यह रचना उस अंतराल को छूती है
जहाँ मन न तो प्रश्न करता है
न ही उत्तर खोजता है।
भावुकता और विचार एक ही श्वास में
मौन के भीतर ठहर जाते हैं,
और वहीं से कविता जन्म लेती है,,,
बिना घोषणा के, बिना शोर के।
आपकी अनुभूति अत्यंत सच्ची और गहराई से स्पर्श करने वाली है।
-विजय
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बहुत बहुत आभार 🙏
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‘शांत मन में जैसे प्रलय’—यह पंक्ति रोंगटे खड़े करने वाली है। सृजन की पीड़ा और आनंद को आपने बहुत ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है। एक बेहतरीन कविता का जन्म! ❤️
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बहुत बहुत आभार आशीष 😊
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