प्रेम तन से अमर नहीं प्रिये,
जो मन हो तो आना,
पुष्प सुमन सब खिल जाएँगे ,
जो खिले अंतर्मन तो आना,
सुबह की किरणे लाते हो नित्य ,
जब चेहरे पर हो धूप तो आना
मन में बिखरे पड़े हैं ,
कुछ शब्द ,
कहानी तो बना दूँ,
पर किरदार कहाँ से लाऊँ??
प्रेम तन से अमर नहीं प्रिये,
जो मन हो तो आना,
पुष्प सुमन सब खिल जाएँगे ,
जो खिले अंतर्मन तो आना,
सुबह की किरणे लाते हो नित्य ,
जब चेहरे पर हो धूप तो आना
मन में बिखरे पड़े हैं ,
कुछ शब्द ,
कहानी तो बना दूँ,
पर किरदार कहाँ से लाऊँ??
बहुत सुंदर! यह पंक्तियाँ प्रेम और अंतरात्मा की कोमल छाया को सीधे छू जाती हैं। बाहरी रूप नहीं, अंतर्मन की खिलनाही असली सुंदरता है।
प्रेम तन से नहीं, मन से होता है यह पंक्तियाँ सीधे अंतरात्मा की गहराई में उतरती हैं। बाहरी खिलावट क्षणिक है, पर अंतर्मन में खिला हर पुष्प शाश्वत है। आपका भाव-संवेदनशील कथन भीतर की ताजगी और प्रकाश को उजागर करता है।
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Beautiful words
Poetic and deep
Thank You Vijay Ji 🌸🙏🙏
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Beautiful. Those words can make a poetry.
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🌸🌸
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