क्या लिखूँ

क्या लिखूँ कि शब्द मेरे बैरी हो गए

न जाने किस की शरारत थी

नासमझ क्यों न समझे कि

हमे उनकी कितनी चाहत थी


क्या लिखूँ की अब थकी सी है कलम

और फिर छुपती धूप का सितम

शायद इशारा है एक विराम का

यूँ ही नहीं बदल रहा है मौसम

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8 thoughts on “क्या लिखूँ

  1. अति सुंदर प्रस्तुति! धूप भी उगेगा और शब्द भी लौटेंगे, समय समय की बात है , क्योंकि समय भी बदलता है और उसकी फ़ितरत भी! नये वर्ष की असीमशुभकामनाओं के साथ 🎉💐🎉

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  2. क्या लिखूँ कि शब्द भी अब साथ छोड़ने लगे,
    जिन्हें हम अपना समझे थे
    वही दूर होने लगे।
    न जाने किसकी शरारत थी इस ख़ामोशी में,
    जो बात दिल में थी
    वो लफ़्ज़ों से खोने लगे।
    कलम ने भी आज
    थोड़ा-सा थक कर कहा,
    “अब कुछ देर रुक जाओ,”
    ये पन्ने भी सोने लगे।
    छुपती धूप ने
    आँखों से बस इतना कहा,
    “शाम होने दो,”
    रंग ख़ुद ही ढलने लगे।
    शायद ये इशारा है
    थोड़ा ठहर जाने का,
    यूँ ही नहीं मौसम
    हर रोज़ बदलने लगे।

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