एक कविता

सुनो ,
कभी लिखो मुझ पर ,
तुम कोई कविता तो,
प्रेम के धागो में ,
कुछ एहसास पिरोना,
कुछ अश्रु मोती ले लेना,
लेना क्षण अविस्मरणीय ,
और हाँ एक मोती,
सबसे अलौकिक, चंद्र-सा,
स्वयं -सा सजाना तुम ,,,
!!!!!!!!!!!!!!!!🌸🌸🌸

3 thoughts on “एक कविता

  1. रीना जी,
    आपकी तहरीर कोई साधारण नज़्म नहीं,,,
    ये तो एहसास की रौशनी से बुनी हुई एक ख़ामोश दास्ताँ है,
    जो दिल के सूने गलियारों में भी चाँदनी उतार देती है…
    अगर कभी आप पर कुछ लिखने का करम हुआ,
    तो वो महज़ अल्फ़ाज़ न होंगे,,,
    एक अदा होगी, एक इबादत होगी,
    जहाँ मोहब्बत के नर्म धागों में
    रूह की सदा पिरोई जाएगी…
    आपके अश्क; ये मोती नहीं,
    ये तो दिल की तहों में छुपी वो नमी हैं,
    जो हर हरफ़ को एक पाकीज़गी अता करती है…
    उन्हें लफ़्ज़ों में सहेजना,
    एक ख़ामोश सज़दा करने जैसा होगा…
    और जो वो एक “चाँद-सा, अलौकिक मोती” है,,,
    उसे सजाने की जुर्रत भला कैसे करूँ…
    वो तो पहले ही आपकी ज़ात में
    पूर्णिमा की तरह मुकम्मल और रौशन है…
    उफ् ! आपकी ये पेशकश,,,

    जैसे कोई ख़्वाब, जो आँखों से नहीं,
    रूह से देखा जाता है…
    -विजय

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    1. आपकी इस खूबसूरत व्याख्या को मेरा नमस्कार 🙏
      अंतिम पंक्ति तो जैसे ऊर्जा है साहित्य की
      बहुत बहुत आभार 🙏

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  2. आपकी यह कविता बेहद नाजुक और रोमांटिक भावनाओं से भरी हुई है। 🌸
    प्रेम के धागों में एहसास पिरोने और मोती चुनने का जो सुंदर चित्र आपने पेश किया है, वह दिल को छू जाता है। विशेष रूप से चंद्र-सा मोती—स्वयं जैसा—की कल्पना बहुत ही अलौकिक और मार्मिक लगी। ✨

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