क्या लिखूँ कि शब्द मेरे बैरी हो गए
न जाने किस की शरारत थी
नासमझ क्यों न समझे कि
हमे उनकी कितनी चाहत थी
क्या लिखूँ की अब थकी सी है कलम
और फिर छुपती धूप का सितम
शायद इशारा है एक विराम का
यूँ ही नहीं बदल रहा है मौसम
क्या लिखूँ कि शब्द मेरे बैरी हो गए
न जाने किस की शरारत थी
नासमझ क्यों न समझे कि
हमे उनकी कितनी चाहत थी
क्या लिखूँ की अब थकी सी है कलम
और फिर छुपती धूप का सितम
शायद इशारा है एक विराम का
यूँ ही नहीं बदल रहा है मौसम
अति सुंदर प्रस्तुति! धूप भी उगेगा और शब्द भी लौटेंगे, समय समय की बात है , क्योंकि समय भी बदलता है और उसकी फ़ितरत भी! नये वर्ष की असीमशुभकामनाओं के साथ 🎉💐🎉
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Thank you so much sir🌸🌸
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My pleasure, Reena. Happy to see you back after 7 months. Hope everything is fine at your end.🙏💐🌹
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Hospitalisation twice
Now all ok
Sir
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Glad you’re fine now, but please take care. Wish you all the best 👍
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Thank you so much sir🌸🌸
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क्या लिखूँ कि शब्द भी अब साथ छोड़ने लगे,
जिन्हें हम अपना समझे थे
वही दूर होने लगे।
न जाने किसकी शरारत थी इस ख़ामोशी में,
जो बात दिल में थी
वो लफ़्ज़ों से खोने लगे।
कलम ने भी आज
थोड़ा-सा थक कर कहा,
“अब कुछ देर रुक जाओ,”
ये पन्ने भी सोने लगे।
छुपती धूप ने
आँखों से बस इतना कहा,
“शाम होने दो,”
रंग ख़ुद ही ढलने लगे।
शायद ये इशारा है
थोड़ा ठहर जाने का,
यूँ ही नहीं मौसम
हर रोज़ बदलने लगे।
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बहुत बहुत धन्यवाद आपका 🙏🙏😊
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